Download कबीर की उल्टी वानी - भाग २ | कबीर अमृतवाणी | New Kabir Bhajan 2026 | MP3 Song Free
Track Details & Info
| Song Title | : कबीर की उल्टी वानी - भाग २ | कबीर अमृतवाणी | New Kabir Bhajan 2026 | |
| Artist / Channel | : Kabir Nirgun Music |
| Audio Duration | : 06:06 Min |
| File Size | : 8.38 MB |
| Audio Bitrate | : 192 kbps High Quality |
| Release Date | : July 08, 2026 |
| Total Streams | : 583 views |
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Description & Lyrics
साहिब बंदगी संतों।
संत कबीर दास जी की अनमोल "उलटबांसी" (उल्टी बानी) और आध्यात्मिक दर्शन से प्रेरित यह एक अत्यंत गहरा और रहस्यमयी भजन है - "अनहद की गुफा देख भाई"। इस भजन के माध्यम से कबीर साहिब ने सांसारिक बुद्धि से परे भीतर की चेतना और आत्म-साक्षात्कार के गूढ़ रहस्यों को समझाया है। यह भजन मन के भ्रम को मिटाकर, घट के भीतर छिपे उस परमात्मा को खोजने का संदेश देता है, जहाँ बिना बादलों के अमृत बरसता है और बिना बाती के अखंड दीपक जलता है।
उलटी गंगा बह रही, पावन भया शरीर।
खोजत-खोजत मिल गया, भीतर ही सत कबीर॥
अनहद की एक गुफा देख भाई, जहाँ शब्द बिना धुन बाजे,
बिन सुर ताल के नाच मयूर, बिन बादर के बरसे गाजे।
दीपक जले न बाती काहू, बिन तेल की जोत अगाध,
अंधियारे में सूरज चमके, मन का मिटे सकल प्रमाद।
बकरी पीवे दूध शेर का, भेड़िया चरावे गैया,
नदी बहे उल्टी धारा में, नाव चले बिन नैया।
खेत में फसल न कोई बोई, फिर भी भंडार अपार,
जो कोई इस रस को चखे, पावे मुक्ति का द्वार।
कहे कबीर सुनो रे संतों, जो जागा सोई घर आवे।
उलटी चाल चले जो ज्ञानी, सोई परम पद पावे।
सागोन के पेड़ पे आम पका है, बिन जड़ का वृक्ष महान,
धरती डोले अंबर के ऊपर, ज्ञानी हुए अज्ञान।
काँच की पुतली लोहा काटे, सुई में हाथी समाए,
जो इस ताने-बाने को समझे, वही अमर पद पाए।
बिन पैरन के पंथ पधारे, बिन मुख बोले सब भेद,
मौन रह्यो सो सब कुछ जान्यो, हार गए सब वेद।
काया भीतर काया देखी, जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब,
खोया आप जो आप ही में, मिट गए सब जन्म के बिम्ब।
कहे कबीर सुनो रे संतों, जो जागा सोई घर आवे।
उलटी चाल चले जो ज्ञानी, सोई परम पद पावे।
मछली बैठी पेड़ की डाली, पंछी पानी में नहाए,
रात को उगे दोपहर का सूरज, तारा भोर में गाए।
प्यास बुझे बिन पानी पीते, भूख मिटे बिन अन्न,
राम नाम की ऐसी खुमारी, मस्त भया तब मन्न।
महल बना है बिना नींव के, जिसमें ग्यारह द्वार,
चोर पहरेदारी करता, राजा मांगे भीख पुकार।
ताला खुला पर चाबी खोई, बंद घर में उजियारा,
परख सके जो इस कौतुक को, मिला उसे संसारा।
अमृत घूंट पिए जो निर्भय, काल उसे न छुवे,
साहिब से जो प्रीत लगाई, वह सब दुःख खोवे.
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